कमबख्त मौत भी नसीब न हुई उम्र यही कोई 75 साल होगी, नाम बंसीलाल। उनका चेहरा ज़माने भर का बोझ उठाने की तकलीफ बयां कर रहा है. पिछले तीन सालों से अपना डेरा-डकोला लेकर सड़क पर बसर कर रहे हैं, खुद नहीं आए, बेटे ने घर से निकाल दिया। वज़ह ये थी कि तीन साल पहले पैरालिसिस के अटैक से शरीर के एक हिस्सा निष्प्राण हो गया. रेलवे में हेल्पर की नौकरी छूटी और इधर बेटे ने घर निकाला दे दिया। बंसीलाल के ऊपर मानो एक साथ दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कुछ नहीं सूझा तो ज़हर खाकर जिंदगी ख़त्म करने की कोशिश की, बच गए. कुछ दिन भटकने के बाद एक दिन फिर आंख में पट्टी बांधकर शिप्रा में कूद गए. यहां भी जिंदगी ने धोखा दिया और बंसीलाल बच निकले। कहने लगे बड़े जतन किए, लेकिन कमबख्त मौत भी नसीब न हुई. शायद उसे भी ग़रीबी पसंद नहीं है। इसे वक़्त की रवानी कहिए या यथास्थिति की समझ. तीन साल बाद बंसीलाल बंसी भगत हो गए हैं. उन्होंने अपना अड्डा अस्पताल के बाहर जमाया है. वहां एक मंदिर है, बंसी भजन करते हैं. कोई दुखी, बेसहारा, निराश आए तो उसे सलाह भी देते हैं. परंतु पेट अब भी मांगकर ही भर पाते हैं. सोचने लगा, हमने हर व्यक्ति को उसका प...