तुम्हारे होने न होने के बीच

तुम्हारे होने न होने के बीच
गढ़ता हूं कुछ सपने
सच्चाईयां
तकलीफें
और वो अनगढ़ सी यादें
जो महसूस करता हूं
तुम्हारे दूर होने पर.
तुम्हारे होने न होने के बीचमैंने छोड़ दिया है स्वप्न देखना
उम्मीद करना
तरक्क़ी के बारे में सोचना
बेशाख्ता जैसे ज़िंदगी ने
धड़कना छोड़ दिया हो
तुम्हारे होने न होने के बीच
दुनिया ठहर सी गई है.
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें