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[ महानायक की गली के चक्कर ]

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दद्दा अमिताभ बच्चन को दादा साहब फ़ाल्के पुरस्कार मिलने के बाद उनके बारे में कल से इतना कहा और लिखा जा चुका है। इसके बाद मैं क्या लिखूं इसी सोच में पड़ गया। अमिताभ मेरे बचपन से हीरो रहे हैं। तो बात तब की है, जब हम सचिन के बड़े फैन हाफ पैंट पहनकर क्रिकेट खेलने जाते थे और शनिवार को अपने सबसे पहले महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्मों का इंतज़ार करते थे। ये वही दौर था, जब अमिताभ  के जीवन का दूसरा फेज शुरू हो गया था और उनकी बनाई कंपनी (ABCL) को ज़बरदस्त घाटा हुआ था और अमिताभ आर्थिक तंगी में फंस गए थे और उन्हें फ़िल्मो में काम मिलना भी काफी कम हो गया था। अमिताभ के लाखों करोड़ों चाहने वालों की तरह मैं भी उनका बड़ा फैन था। बल्कि ये कहूँ कि जब से सुध सहेजी है, तभी से अमिताभ मेरे हीरो रहे हैं। रियल और रील दोनों के। मेरा छोटा भाई अमित पांडेय और मैं शनिवार को सबके सो जाने के बाद टीवी (दूरदर्शन) पर अमिताभ की फिल्म लगा लेते थे और ब्रेक होने पर एक-दूसरे को नींद न आ जाए इसलिए फ़िल्म की चर्चा करने लगते थे। बेताबी इतनी होती थी कि पूरे घर के लोगों के साथ हम झूठ-मूठ का सो जाते थे, फिर चुपके से उठकर टीवी...

ज़िद पर अड़े रहो... खड़े रहो.

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कितनी भी कठिनाई क्यों न आए, जीवन को रुकना नहीं चाहिए चलते रहना चाहिए।  कुछ ऐसी ही कहानियां लेकर इस बार अमिताभ बच्चन केबीसी में आए हैं। एकदम दबे-कुचले, अंतिम पंक्ति और गांव-देहात की प्रतिभाएं, जिन्हें कभी मंच नहीं मिला। उन्हें केबीसी मंच दे रहा है। यहां से जो भी प्रतिभागी रकम जीतकर जाते हैं, वह अपने सपनों को पूरा करते हैं। इससे एक बात तो तय है इस देश में हर किसी के लिए अवसर उपलब्ध हैं। बस हाथ बढ़ाकर उसके लपक लेने की है। केबीसी की थीम है, जिद पर अडे रहो, खड़े रहो। मैं इसे थोड़ा दूसरी तरह से लेता हूं ज़िद है तो जज्बा होना जरूरी है और जज्बे के साथ जुनून का होना उतना ही जरूरी है। तभी आप वहां पहुंच पाएंगे जहां आप पहुंचना चाहते हैं। कुछ-कुछ एपिसोड मैंने ऐसे भी देखे हैं, जिसमें ऐसे प्रतिभागी आए, जो हिम्मत हार चुके थे लेकिन केबीसी उनके लिए सहारा बन गया और वह जीवन में आगे बढ़ गए।  असल में यह जो बाजार है, वह मशीनी हो गया है। जब तक इंसान के पास रुपए नहीं है, पैसे नहीं है ताकत नहीं है, पावर नहीं है। तब तक उस मशीन को आयल नहीं मिलता, और तब वह चल नहीं पाती है। मशीन पड़ी रहती है उसमें जंग...