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मेरा रंग दे बसंती चोला...

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भारत भवन के खुले मंच पर बड़े तालाब से आती सर्द हवाओं में ठंडक तो हर रोज़ की तरह ही थी... लेकिन उसका असर ज़रा कमतर था क्योंकि आज इस मंच पर देश के वीर जियालों राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां की दास्ताँ सुनी-सुनाई जा रही थी ऐसे में माहौल में गर्माहट आनी ही थी। करीब दो घंटे के इस किस्से को दास्तानगो Himanshu Bajpai ने इस खूबसूरत अदा, खरस भरी आवाज़ और उर्दू लहज़ा के साथ कही कि सुनने वाले कभी आह किए तो कभी वाह करते रहे... यूँ तो किस्से बहुत कहे-सुने जाते हैं पर आज की शाम कुछ अलग, ख़ास और अलहदा थी। शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले... वतन पर मिटने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा... ये आख़िरी कलाम था, जो इस दास्ताँ को मुक़म्मल बनाता है... काकोरी की मशहूर डकैती से शुरू हुई कहानी जिसे आज़ादी के नायकों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, सचिंद्र नाथ सान्याल, मन्मथ नाथ गुप्त और रोशन सिंह जैसे वीरों ने सर अंजाम दिया था। ये दास्ताँ उनके पकड़े जाने, जेल जाने और लखनऊ में फांसी की सज़ा होने तक और अंत में बसंती चोला पहनकर फाँसी के फंदे पर झूल जाने की है। दीवानों ने क...

मेरे दादा जान मुज़तर खैराबादी के हाथ का लिखा था- न किसी की आंख का नूर हूं...

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भोपाल में मशहूर शायर-गीतकार जावेद अख्तर ने 'यादे मजाज़-ओ-मुज़तर खैराबादी' कार्यक्रम में सुनाए किस्से...   तीन दिन के लिए भोपाल आए मशहूर शायर, गीतकार और किस्सागो जावेद अख्तर के अलग ही रूपों से परिचय हुआ। अखबार के कार्यक्रम में वह अपने फिल्मी गीतों के बनने के किस्सों के साथ नुमायां हुए तो बाकी दो दिन अपने मामा जान मज़ाज लखनवी और दादा जान मुज़तर खैराबादी के किस्सों से दिल को तर कर गए। उन्होंने मज़ाज की लखनऊवा ज़िंदगी और उनके असफल इश्क और उनकी संगत में खुद कब पढ़ाई लिखाई और शायरी में मशरूफ हो गए। ये सब किस्से थे, ये ऐसा था जैसे वह उस लखनऊ को भोपाल में वापस ले आए हों। वह यादे सुखन था, जिसमें हर सुनने वाला भोपाल में उनके आखिरी दिन के किस्से और तीन किश्तों की सीरीज में पहली किश्त...  वाह-वाह कर रहा था... कार्यक्रम 'यादे मजाज़-ओ- मुज़तर खैराबादी' में गीतकार, शायर जावेद अख्तर ने अपने दादा मुज़तर खैराबादी की गज़लों पर बात की। उन्होंने कहा- न किसी की आंख का नूर हूं/ न किसी के दिल का क़रार हूं...जो किसी के काम न आ सके/मैं वो एक मुश्त-ए-गु़बार हूं... यह गज़ल हममें से कई लोगों ने...