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कठिन है मेरे लिए

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जिंदगी की डायरी और उसके कोरे पन्ने उनमे बिखरी धुंध जो छंटने का नाम ही नहीं ले रही बहुत हो गया अब उसे धो-पोंछकर साफ कर देना चाहता हूं ताकि लिख सकूं नई इबारतें इबारतें आंसू बहाते प्रेम की नहीं उस प्रेम की जिसकी ध्वनि-तरंगों में समाहित हो जाए ये धरती और सारा आसमान पहाड़-नदियां-झरने और वो सब कुछ जिसे पाना सामान्य मनुष्य के बतौर कठिन है मेरे लिए.
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_____________ हाय रे क्रूर नियति     मैं जो तुम्हारे दर्पभरे उदास अकेलेपन की     खिल्ली उड़ाने वाले उग्र, अंधे, दंतैल     पशुओं को बींध डालती हूं, वही मैं     दूर थी तुम्हारी चरम आवश्यकता के क्षणों में     तुम्हारे संकरे विश्राम स्थल के निकट खड़ी     मैं पुकारती हूं, पुकारती ही जाती हूं     तुम मुझे उत्तर नहीं देते     क्या तुम्हारे मुख पर मिट्टी का बोझ     बहुत भारी हो गया है     या वर्ष-भर नींद की चुप्पी इतनी गहरी हो गई है     कि इस तक नहीं पहुंचती      दोस्ती, क्षमा या वेदना... - भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की एक कविता, जो उन्होंने जिन्ना की याद में लिखी थी, हालांकि कैथरीन खुद किताब में इसे पक्के तौर पर सही नहीं ठहराती हैं. (फ्रांसीसी लेखिका कैथरीन क्लैमा की किताब "नेहरू और एडविना" से साभार.)

तुम्हारे होने न होने के बीच

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तुम्हारे होने न होने के बीच गढ़ता हूं कुछ सपने सच्चाईयां तकलीफें और वो अनगढ़ सी यादें जो महसूस करता हूं तुम्हारे दूर होने पर. तुम्हारे होने न होने के बीच मैंने छोड़ दिया है स्वप्न देखना उम्मीद करना तरक्क़ी के बारे में सोचना बेशाख्ता जैसे ज़िंदगी ने धड़कना छोड़ दिया हो तुम्हारे होने न होने के बीच दुनिया ठहर सी गई है.

मैं, ख्वाबों का शहज़ादा

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दुविधा में ये दिन बीते कश्मकश में काटी रात आँख खुली तो हुआ सबेरा कुछ भी न आया हाथ. ख्वाब था शायद ख्वाब ही होगा सच्चाई में तनिक घुला सा थोड़ा धुंधला, थोड़ा धुला सा मैंने रात ख्वाबों का सफ़र किया था सफ़र, जो रात के अँधियारे में नहीं दिन के उजाले में करता हूँ  उनके सच होने का इंतजार करता हूँ  ख्वाब के साथ उम्मीद जुड़ी है जानता हूँ ख्वाब सच नहीं होते  फिर अपने आप को ख्वाबों का शहज़ादा कहता हूँ. 
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कमबख्त मौत भी नसीब न हुई  उम्र यही कोई 75 साल होगी, नाम बंसीलाल। उनका चेहरा ज़माने भर का बोझ उठाने की तकलीफ बयां कर रहा है. पिछले तीन सालों से अपना डेरा-डकोला लेकर सड़क पर बसर कर रहे हैं, खुद नहीं आए, बेटे ने घर से निकाल दिया। वज़ह ये थी कि तीन साल पहले पैरालिसिस के अटैक से शरीर के एक हिस्सा निष्प्राण हो गया. रेलवे में हेल्पर की नौकरी छूटी और इधर बेटे ने घर निकाला दे दिया। बंसीलाल के ऊपर मानो एक साथ दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कुछ नहीं सूझा तो ज़हर खाकर जिंदगी ख़त्म करने की कोशिश की, बच गए. कुछ दिन भटकने के बाद एक दिन फिर आंख में पट्टी बांधकर शिप्रा में कूद गए. यहां भी जिंदगी ने धोखा दिया और बंसीलाल बच निकले। कहने लगे बड़े जतन किए, लेकिन कमबख्त मौत भी नसीब न हुई. शायद उसे भी ग़रीबी पसंद नहीं है। इसे वक़्त की रवानी कहिए या यथास्थिति की समझ. तीन साल बाद बंसीलाल बंसी भगत हो गए हैं. उन्होंने अपना अड्डा अस्पताल के बाहर जमाया है. वहां एक मंदिर है, बंसी भजन करते हैं. कोई दुखी, बेसहारा, निराश आए तो उसे सलाह भी देते हैं. परंतु पेट अब भी मांगकर ही भर पाते हैं. सोचने लगा, हमने हर व्यक्ति को उसका प...
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पुराना कैलेंडर, जैसे यादों का बवंडर   ये सिर्फ पुराने जगह, नया कैलेंडर बदलना भर नहीं दरअसल, ये जिंदगी के मायने बदलने जैसा कुछ है पुराना कैलेंडर, जैसे यादों का बवंडर हो इसके साथ ही बदल जाते हैं वो दिन, वो तारीखें, वो पल भी जब हम ख़ुशी से मिले और आंसुओं के साथ जुदा हुए कैलेंडर बदलना जिंदगी को पुनर्निर्मित करना है नए विचारों का आगाज़ करती है नयी तारीख़ अंधेरों से उजाले की तरफ बढ़ने का साहस देती है नयी तारीख़ - सुमित