मेरा रंग दे बसंती चोला...
भारत भवन के खुले मंच पर बड़े तालाब से आती सर्द हवाओं में ठंडक तो हर रोज़ की तरह ही थी... लेकिन उसका असर ज़रा कमतर था क्योंकि आज इस मंच पर देश के वीर जियालों राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां की दास्ताँ सुनी-सुनाई जा रही थी ऐसे में माहौल में गर्माहट आनी ही थी। करीब दो घंटे के इस किस्से को दास्तानगो Himanshu Bajpai ने इस खूबसूरत अदा, खरस भरी आवाज़ और उर्दू लहज़ा के साथ कही कि सुनने वाले कभी आह किए तो कभी वाह करते रहे...
यूँ तो किस्से बहुत कहे-सुने जाते हैं पर आज की शाम कुछ अलग, ख़ास और अलहदा थी। शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले... वतन पर मिटने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा... ये आख़िरी कलाम था, जो इस दास्ताँ को मुक़म्मल बनाता है...
काकोरी की मशहूर डकैती से शुरू हुई कहानी जिसे आज़ादी के नायकों पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, सचिंद्र नाथ सान्याल, मन्मथ नाथ गुप्त और रोशन सिंह जैसे वीरों ने सर अंजाम दिया था। ये दास्ताँ उनके पकड़े जाने, जेल जाने और लखनऊ में फांसी की सज़ा होने तक और अंत में बसंती चोला पहनकर फाँसी के फंदे पर झूल जाने की है। दीवानों ने कितने ज़ुल्मों सितम सहे, फिर भी उफ़्फ़ न कहा। बस गाते गए, मेरा रंग दे बसंती चोला...
किस्सा कुछ यूं बयान हुआ कि मैं टाइम मशीन में बैठकर 1925-27 के उस वक़्त में पहुंच गया हूँ और उसे जी रहा हूँ। असल में, ये किस्सा हिमांशु बाजपेई का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है और भोपाल से ख़ास लगाव की वज़ह से इसे यहाँ पेश करने की चर्चा भी कई बार हुई। आख़िर वो मौका, दस्तूर और दिन आ ही गया। हिमांशु किस्से के साथ ही आज़ादी के इन परवानों के विचार, आदर्श और गंगा-जमुनी तहज़ीब, जो इस देश के मूल में है। देश के हर युवा की ज़ुबान पर लाना चाहते हैं। इसी मक़सद से वह करीब सालभर से लगातार अलग-अलग मंचों से 'सरफ़रोशी की तमन्ना' दास्ताँ को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। यूँ तो उनका 'खुसरो दरिया प्रेम का ' भी ख़ूब है और जिसने इस किस्से को नहीं सुना है तो समझो कुछ नहीं सुना है। कहते हैं न कि अंत में सिर्फ़ प्रेम ही बचा रह जाएगा। क्योंकि ये किस्सा प्रेम, इश्क़, इबादत और हिंदी उर्दू ज़बान की मोहब्बत के पहले शायर, लेखक और कवि ख़ुसरो का है।
#giflif के मंच पर हिमांशु की किस्सागोई, वेदांत भारद्वाज की गायकी और अजय टिपानिया की ढोलक। तीनों की जुगलबंदी ने शाम को एक यादगार के रूप में दर्ज कर दिया। वेदांत जब गाते हैं कि शहीदों की मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा तो बदन में एक झुरझुरी दौड़ जाती है, भावनाओँ की हिलोरें मन को जिंझोड़ देती हैं।
और आख़िर में हिमांशु ने जो कहा, वो सुनकर मन उदास हो जाता है, लगा कि हम कितने खुदगर्ज़ हैं, वो मतवाले जो ख़ुद का बलिदान कर हमें आज़ादी दे गए। हम उनकी मज़ारों, स्मारकों पर एक फूल भी अर्पित न कर सके। हिमांशु कहते हैं, "आज़ाद हिंदुस्तान में शहीदों के स्मारकों, उनके परिजनों और परिवार की बेक़दरी दिल तोड़ने वाली है। राम प्रसाद बिस्मिल की माँ, उनके छोटे भाई और उनके वालिद सब ग़रीबी और ग़ुरबत में इस दुनिया से गए। ठाकुर रोशन सिंह के परिवार की मुसीबतों और बेक़दरी का किस्सा तो आज भी जारी है।"
देश के हालात पर भी हिमांशु ने तंज किया। आज़ादी के मतवालों अशफ़ाक उल्ला खां और राम प्रसाद बिस्मिल इस देश की साँझी संस्कृति के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा- देश भक्ति की बात करने वाले हर शख़्स को अशफ़ाक उल्ला खां की वसीयतनामा पढ़नी चाहिए। हिमांशु बोले- अशफ़ाक और बिस्मिल का सपना किस हिंदुस्तान का था। वह कैसा देश चाहते थे। आज का भारत कैसा भारत है। और कल का भारत कैसा भारत होगा और कल का भारत कैसा होगा...
और आख़िर में अज़ीज़ों हिमांशु का दिल से शुक्रिया...

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