_____________
हाय रे क्रूर नियति
मैं जो तुम्हारे दर्पभरे उदास अकेलेपन की
खिल्ली उड़ाने वाले उग्र, अंधे, दंतैल
पशुओं को बींध डालती हूं, वही मैं
दूर थी तुम्हारी चरम आवश्यकता के क्षणों में
तुम्हारे संकरे विश्राम स्थल के निकट खड़ी
मैं पुकारती हूं, पुकारती ही जाती हूं
तुम मुझे उत्तर नहीं देते
क्या तुम्हारे मुख पर मिट्टी का बोझ
बहुत भारी हो गया है
या वर्ष-भर नींद की चुप्पी इतनी गहरी हो गई है
कि इस तक नहीं पहुंचती
दोस्ती, क्षमा या वेदना...
- भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की एक कविता, जो उन्होंने जिन्ना की याद में लिखी थी, हालांकि कैथरीन खुद किताब में इसे पक्के तौर पर सही नहीं ठहराती हैं.
(फ्रांसीसी लेखिका कैथरीन क्लैमा की किताब "नेहरू और एडविना" से साभार.)
हाय रे क्रूर नियति
मैं जो तुम्हारे दर्पभरे उदास अकेलेपन की
खिल्ली उड़ाने वाले उग्र, अंधे, दंतैल
पशुओं को बींध डालती हूं, वही मैं
दूर थी तुम्हारी चरम आवश्यकता के क्षणों में
तुम्हारे संकरे विश्राम स्थल के निकट खड़ी
मैं पुकारती हूं, पुकारती ही जाती हूं
तुम मुझे उत्तर नहीं देते
क्या तुम्हारे मुख पर मिट्टी का बोझ
बहुत भारी हो गया है
या वर्ष-भर नींद की चुप्पी इतनी गहरी हो गई है
कि इस तक नहीं पहुंचती
दोस्ती, क्षमा या वेदना...
- भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की एक कविता, जो उन्होंने जिन्ना की याद में लिखी थी, हालांकि कैथरीन खुद किताब में इसे पक्के तौर पर सही नहीं ठहराती हैं.
(फ्रांसीसी लेखिका कैथरीन क्लैमा की किताब "नेहरू और एडविना" से साभार.)

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें