जावेद अख्तर साहब कहते हैं...
यहां जाना, वहां जाना, इससे मिलना, उससे मिलना
हमारी जिंदगी ऐसी है जैसे रेलवे स्टेशनों पर अपने-अपने डिब्बे ढूंढते कोई मुसाफिर हों।
जिंदगी की डायरी और उसके कोरे पन्ने उनमे बिखरी धुंध जो छंटने का नाम ही नहीं ले रही बहुत हो गया अब उसे धो-पोंछकर साफ कर देना चाहता हूं ताकि लिख सकूं नई इबारतें इबारतें आंसू बहाते प्रेम की नहीं उस प्रेम की जिसकी ध्वनि-तरंगों में समाहित हो जाए ये धरती और सारा आसमान पहाड़-नदियां-झरने और वो सब कुछ जिसे पाना सामान्य मनुष्य के बतौर कठिन है मेरे लिए.
तुम्हारे होने न होने के बीच गढ़ता हूं कुछ सपने सच्चाईयां तकलीफें और वो अनगढ़ सी यादें जो महसूस करता हूं तुम्हारे दूर होने पर. तुम्हारे होने न होने के बीच मैंने छोड़ दिया है स्वप्न देखना उम्मीद करना तरक्क़ी के बारे में सोचना बेशाख्ता जैसे ज़िंदगी ने धड़कना छोड़ दिया हो तुम्हारे होने न होने के बीच दुनिया ठहर सी गई है.
_____________ हाय रे क्रूर नियति मैं जो तुम्हारे दर्पभरे उदास अकेलेपन की खिल्ली उड़ाने वाले उग्र, अंधे, दंतैल पशुओं को बींध डालती हूं, वही मैं दूर थी तुम्हारी चरम आवश्यकता के क्षणों में तुम्हारे संकरे विश्राम स्थल के निकट खड़ी मैं पुकारती हूं, पुकारती ही जाती हूं तुम मुझे उत्तर नहीं देते क्या तुम्हारे मुख पर मिट्टी का बोझ बहुत भारी हो गया है या वर्ष-भर नींद की चुप्पी इतनी गहरी हो गई है कि इस तक नहीं पहुंचती दोस्ती, क्षमा या वेदना... - भारत कोकिला सरोजिनी नायडू की एक कविता, जो उन्होंने जिन्ना की याद में लिखी थी, हालांकि कैथरीन खुद किताब में इसे पक्के तौर पर सही नहीं ठहराती हैं. (फ्रांसीसी लेखिका कैथरीन क्लैमा की किताब "नेहरू और एडविना" से साभार.)
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