आरे के जंगल मामले में कहीं देर तो नहीं हो गई

सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई के आरे कॉलोनी इलाक़े के जंगल के पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी, लेकिन इस आदेश को आने में देर तो नहीं हो गई है। असल में, मुंबई हाईकोर्ट के आरे कॉलोनी के पेड़ों को जंगल नहीं मानने के आदेश के बाद मेट्रो कॉरपोरेशन ने दो दिन में करीब 1500 पेड़ काट दिए गए। और महाराष्ट्र सरकार ने बड़ी ही बेशर्मी से सुप्रीम कोर्ट में कहा भी कि मेट्रो शेड बनाने के लिए जितने पेड़ों को काटने की जरुरत थी, वो काट ली गई है, अब आगे कोई पेड़ नहीं काटा जाएगा।


शिवसेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' में लिखा है कि अपना ही घर दुखदाई हो गया है। तो क्या शिवसेना, जो महाराष्ट्र सरकार में भाजपा के साथ सहभागीदार है। उसे इसकी जानकारी पहले से नहीं थी। सब दिखावा है, छला गया है लोगों को, प्रकृति को और हमारी आने वाली पीढ़ी और अपने बच्चों को। जिन्हें हम प्रदूषण और जानलेवा पर्यावरण उपहार में देकर जाएंगे। आरे के जंगलों को दो दिन में सरकार और मेट्रो कारपोरेशन ने रातोंरात कटवा डाला। इतनी जल्दबाजी या त्वरित कार्रवाई सरकार जनता से जुड़े दूसरे मामलों में भी ले तो शायद कुछ भला हो। जितने पेड़ काटे गए हैं, इससे अब आरे का इको सिस्टम लगभग खत्म हो जाएगा। वहां पर पाए जाने वाले सैकड़ों प्रकार के पशु, पक्षी, चिड़िया, चींटियां, कीड़े-मकौड़े, केंचुए, सांप-बिच्छू सब कहां जाएंगे। हमने सबके घर नष्ट कर दिए, विकास के नाम पर विनाश किया और 2700 पेड़ निगल गए और निगलने पर आमादा हैं। फिल्म कलाकार, विद्यार्थी, सामाजिक संगठन, महिलाएं-बच्चे, आरे के जंगलों में रहने वाले आदिवासी-निवासी सबने अपनी क्षमता के बराबर जंगल को काटे जाने का विरोध किया और रोकने के प्रयास किए, लेकिन विनाशकों ने रात-रातभर आरा मशीनें चलाकर बड़े-बड़े पेड़ों को फसल की तरह काट कर गिरा दिया। रात को भी लोग विरोध करने पहुंचे, लेकिन उन्हें रोका नहीं जा सका। वह पुलिस और प्रशासन के साथ आए थे। सच ही कानून अंधा होता है, तभी तो हाईकोर्ट के जजों को आरे में जंगल नहीं दिखाई नहीं दिया। भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जो उन्हें मामले को संज्ञान में लिया और पेड़ काटने पर फौरन रोक लगा दी।


परंतु बात फिर वहीं आकर अटक जाती है। हमें सोचना पड़ेगा। वन्य जीवन के लिए, पर्यावरण के लिए। कुछ दिन पहले की ही बात है, जब स्वीटन की किशोरी ग्रेटा थनबर्ग ने दुनिया में पर्यावरण को बचाने के लिए आंदोलन छेड़ रखा है और हमारे प्रधानमंत्री मोदी दुनियाभर के मंचों में उस नन्हीं सी लड़की का समर्थन करते हैं। मंचों से जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं, लेकिन देश लौटकर वह भी आंख मूंद लेते हैं। उन्हें भी तो चीन, अमेरिका और जापान की बराबरी करना है, ये अलग बात है कि ये चिंताएं बातों में ही ज्यादा दिखती हैं, जमीनी हकीकत अलग है। तो हमें सोचने की सख्त जरुरत है। क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश की कविता का एक अंश है... प्यार करना और लड़ सकना जीने पर ईमान ले आना मेरी दोस्त, यही होता है धूप की तरह धरती पर खिल जाना और फिर आलिंगन में सिमट जाना बारूद की तरह भड़क उठना और चारों दिशाओं में गूंज जाना - जीने का यही सलीका होता है प्यार करना और जीना उन्हे कभी नहीं आएगा जिन्हें जिन्दगी ने बनिए बना दिया...

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